नहीं होगा बंगाल में बिहार नतीजे का असर,कर्नाटक में सियासी संग्राम तेज sunday view west bengal tmc bjp state bill supreme court karnataka congress


मनीष सभरवाल ने इंडियन एक्सप्रेस में फणीश्वर नाथ रेणु की 1954 के क्लासिक हिंदी उपन्यास मैला आंचल के हवाले से कहा है कि बिहार की आदर्शवादी राजनीति—समता, न्याय और जन-शक्ति—को लेन-देन की राजनीति व कुलीन हेरफेर से हारते दिखाया था. हालिया बिहार चुनाव बदलाव का संकेत देते हैं. “हर परिवार को सरकारी नौकरी” का वादा जनता ने अव्यावहारिक बताकर खारिज कर दिया . इस पर राज्य बजट का पाँच गुना खर्च होता. लेकिन यह हमें याद दिलाता है कि पिछड़े राज्यों में रोजगार सृजन के लिए नए विचार जरूरी हैं. हाल की श्रम संहिताओं की अधिसूचना मुख्यमंत्रियों को औपचारिक, उच्च-वेतन व उच्च-उत्पादकता वाले निजी नियोक्ताओं के लिए अनुकूल माहौल बनाने की शक्ति देती है. असली समस्या “रोजगारयुक्त गरीबी” (कम वेतन वाली नौकरियां) और अव्यावहारिक स्वरोजगार (स्व-शोषण) है. बिहार में उच्च उत्पादकता वाले नियोक्ताओं की कमी और सेक्टर्स का अभाव है.

चार संहिताएं अपूर्ण हैं; एक ही काफी. लेकिन ये अच्छी नौकरियां पैदा करने के लिए भारत को बेहतर बनाती हैं. ये नियामकीय कोलेस्ट्रॉल को विश्वास-आधारित व्यवस्था से बदलती हैं—जेल को निरोधक मानना छोड़, स्व-पंजीकरण लाना, निरीक्षकों के दुरुपयोग से भ्रष्टाचार रोकना, सब अनुमत मानना. पुरानी व्यवस्था छोटे नियोक्ताओं को चोट पहुँचाती, 50% श्रमशक्ति को स्व-शोषण में धकेलती, कानून पर हास्य पैदा करती. ट्रेड यूनियनों का स्वार्थ बुजुर्ग सदस्यों पर था, लेकिन 65% आबादी 35 से कम उम्र की है. राज्यों को नियम-निर्माण में स्वायत्तता मिली.

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